नामरूप के चिंतन का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं भीष्म – आचार्य राजेंद्रदास
महेश वर्मा ब्यूरो मथुरा
वृंदावन। नामरूप चिंतन में लीन रहने वालों का स्वयं भगवान भी चिंतन करते हैं और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भीष्म हैं। उक्त विचार स्थानीय वंशीवट स्थित श्री मलूक पीठ बिहारी सेवा संस्थान में श्रीमद जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री मलूकदास देवाचार्य महाराज ने 451वें जयंती महोत्सव के तृतीय दिवस व्यासपीठ से बोलते हुए श्री मद जगदगुरू अग्रदेवाचार्य एवं मलूक पीठाधीश्वर डॉ राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने आगे वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्री कृष्ण को चिंतन करते देख पांडवों ने पूछा कि जिसका स्वयं ब्रह्मा और शंकर भी निरंतर चिंतन करते हों, वे स्वयं आखिर किसका चिंतन कर रहे हैं। तब भक्तवत्सल भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि महीनों से कुरुक्षेत्र में शरशैय्या में रक्तरंजित अवस्था में बिना किसी छाया के आंधी तूफान धूप में पड़े हुए और बिना अपने कष्ट का स्मरण किए, मेरा चिंतन कर रहे हैं, तो मैं उसका चिंतन किए बिना कैसे रह सकता हूं। उन्होंने ऐसे कृपामृत बरसाने वाले प्रभु का सदैव चिंतन ही प्रत्येक मनुष्य के उद्धार का मार्ग बताया। इससे पूर्व प्रातःकालीन सत्र में रासाचार्य कुंज बिहारी शर्मा के निर्देशन में बंशी चोरी लीला का प्रस्तुतीकरण किया गया। इस अवसर पर पूज्य श्री किशोरदास देव जू “गोरेलाल कुंज वाले महाराज, श्री बिहारीदास जी महाराज, श्री हित अम्बरीष जी महाराज के अतिरिक्त संत रसिक माधव दास जी महाराज, संत गंगादास जी महाराज, अनुराग दास महाराज, धनंजय दास महाराज सहित अनेकों संत महंत उपस्थित रहे।

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