SCBA अध्यक्ष ने कोलेजियम सिस्टम की कमियों पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस सिस्टम में पारदर्शिता की घोर कमी है और महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद सीमित है। सवाल ये है कि अगर सर्वोच्च न्यायालय की नियुक्तियों में ही महिलाओं और विविध समाज का संतुलित प्रतिनिधित्व नहीं होगा तो फिर न्यायपालिका से समानता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
असल में कोलेजियम सिस्टम पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। जज अपने ही उत्तराधिकारी चुनते हैं, निर्णय बंद कमरों में होते हैं, न कोई सार्वजनिक मानक, न संसद की भूमिका और न ही जनता के प्रति जवाबदेही। नतीजा यह है कि यह सिस्टम अक्सर नेपोटिज़्म, गुटबाज़ी और “अपने-अपने लोगों” को तरजीह देने के आरोपों से घिरा रहता है। यही कारण है कि कई बार योग्य और प्रतिभाशाली वकील पीछे छूट जाते हैं और “नेटवर्क वाले” आगे बढ़ जाते हैं।
आज SCBA की यह चिट्ठी सिर्फ़ एक औपचारिक पत्र नहीं है, बल्कि न्यायपालिका के भीतर से उठी चेतावनी है — कि अब बदलाव अनिवार्य है। अगर कोलेजियम सिस्टम को नहीं बदला गया, तो जनता के बीच न्यायपालिका की विश्वसनीयता लगातार घटती जाएगी।
दरअसल कोलेजियम सिस्टम अब लोकतांत्रिक भारत के लिए बोझ बन चुका है। इसे या तो पूरी तरह से बदलना होगा या फिर इसमें ऐसी संरचनात्मक सुधार करने होंगे, जिससे पारदर्शिता, जवाबदेही और विविधता सुनिश्चित हो सके।
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